छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का यह कथन कि “आदिवासी सबसे बड़े हिंदू हैं” महज़ एक बयान नहीं, बल्कि एक लंबे समय से चल रही वैचारिक साजिश का औपचारिक उद्घोष है। यह कथन दरअसल उस रणनीति का हिस्सा है जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उनके सहायक संगठनों ने दशकों से सुनियोजित ढंग से आगे बढ़ाया है – एक ऐसी राष्ट्र-परिकल्पना के निर्माण हेतु जिसमें जाति-आधारित ब्राह्मणवादी वर्णाश्रमगत ढांचे को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हो और भारत की समावेशी सांस्कृतिक विविधता को एक “एकरूप हिंदू पहचान” में विलीन कर दिया जाए।
आदिवासी संस्कृति : एक स्वतंत्र जीवन दृष्टि
भारत के आदिवासी समुदायों की संस्कृति कोई उपधर्म या उपजातीय परंपरा नहीं, बल्कि एक पूर्ण जीवन-दृष्टि है। यह संस्कृति जंगलों, नदियों, पर्वतों और धरती के साथ सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित है। उनकी पूजा-पद्धतियाँ लोक-आधारित हैं, जिसमें ‘बुढ़ा देव’, ‘थान देव’, ‘ग्राम देवी’ जैसे प्रकृति और पूर्वजों से जुड़े प्रतीक प्रमुख होते हैं। वे मूर्तियों को पूजते नहीं, बल्कि उन्हें बनाते हैं – मिट्टी, लकड़ी और पत्थर से। उनकी संस्कृति में न पंडित हैं, न शास्त्र, न गीता और न वेद। उनका ज्ञान अनुभवजन्य और पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्मृति में जीवित रहता है, जिसका अनुपालन वे अपने ढ़ंग से सदियों से करते आ रहे हैं।
हिन्दू धर्म से मौलिक भिन्नता
हिंदू धर्म एक विशिष्ट वर्ण-व्यवस्था, कथित पौराणिक शास्त्रों, कर्मकांडों और ब्राह्मणवादी प्रभुत्व से संचालित ढांचा है। इसमें जातियाँ, ऊँच-नीच और धार्मिक कर्मकांड केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। इसके विपरीत, आदिवासी समाज की संरचना सामूहिकता, समानता, श्रम और प्रकृति आधारित होती है। वहां कोई मनु नहीं, कोई वर्ण नहीं, कोई आत्मा के मोक्ष की चिंता नहीं है बल्कि वहाँ जीवन है, प्रकृति है और सामाजिक संतुलन है। यह एक ऐसी संस्कृति है जो वर्चस्व नहीं, सहभागिता में विश्वास करती है।
आरएसएस और भाजपा की साजिशपूर्ण रणनीति
आरएसएस और भाजपा ने आदिवासी संस्कृति को “हिंदू” कहकर अपने राजनीतिक एजेंडे में समाहित करने के लिए कई स्तरों पर संगठित हस्तक्षेप किए हैंः
भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक विखंडन:
आदिवासियों को ‘आदिवासी’ न कहकर ‘वनवासी’ कहा जाता है – यह केवल शब्द का खेल नहीं, बल्कि उनकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भूमि-अधिकारों को खत्म करने की चतुर चाल है। ‘आदिवासी’ शब्द जहाँ मूलनिवास और अधिकार की चेतना जगाता है, वहीं ‘वनवासी’ केवल निवास स्थान को इंगित करता है।
‘घर वापसी’ अभियान:
RSS से जुड़े संगठनों द्वारा यह प्रचार किया जाता है कि आदिवासी कभी हिंदू थे और उन्हें वापस “धर्म की मुख्यधारा” में लाया जाना चाहिए। यह ऐतिहासिक रूप से गलत और सांस्कृतिक हिंसा एवं उपनिवेश का एक रूप है, जो उनकी स्वतंत्र सांस्कृतिक परंपराओं को दूषित करने तथा उन पर अपना सांस्कृतिक आधिपत्य स्थापित करने की कोशिश करता है।
शैक्षिक और सांस्कृतिक उपनिवेश:
सरस्वती शिशु मंदिर, एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम, विवेकानंद केंद्र आदि घोषित-अघोषित संस्थानों या अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से आदिवासी बच्चों को पौराणिक कथाओं, रामायण, गीता, संस्कृत श्लोकों और ब्राह्मणवादी मूल्य-व्यवस्था में ढाला जा रहा है। यह भावी पीढ़ी की सांस्कृतिक चेतना को विकृत करने तथा उन्हे मिटाने की प्रक्रिया है।
धार्मिक आयोजनों का राजनीतिक हथियार:
आदिवासी क्षेत्रों में हवन, रामकथा, देवी जागरण, योग दिवस और दुर्गा पूजा जैसे आयोजनों को सरकारी सहायता से आयोजित कर उनकी पारंपरिक लोक-धार्मिक गतिविधियों को हाशिये पर डाला जा रहा है। इसके साथ ही यह भी देखा गया है कि छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों में प्रचलित पारंपरिक आदिवासी मंदिरों के विकास एवं सौंदर्यीकरण की आड़ में उनके स्थलों पर हिंदू देवी-देवाताओं की विशालकाय मूर्तियों को स्थापित किया जा रहा है। यह कार्य प्रशासनिक अधिकारियों के जरिये किया या कराया जा रही है। यह एक तरह से ब्राह्मणवादी संस्कृति द्वारा आदिवासियों के धार्मिक एवं सांस्कृतिक के स्थलों का अतिक्रमण है।
मुख्यमंत्री का बयान: आत्मविरोध की चरम अभिव्यक्ति
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का यह कहना कि “आदिवासी सबसे बड़े हिंदू हैं”, न केवल ऐतिहासिक तथ्यहीनता है, बल्कि यह एक ऐसी विचारधारा के समक्ष आत्मसमर्पण है जो सदियों से आदिवासियों को ‘अन्य’, ‘दस्यु’, ‘मूलशूद्र’ और ‘सभ्यता से बाहर’ मानती रही है। एक आदिवासी मूल का व्यक्ति जब अपने ही समाज की सांस्कृतिक अस्मिता को नकारते हुए मनुवादी ढांचे को आत्मसात करता है, तो यह सत्ता के लिए की गई सांस्कृतिक आत्महत्या है।
क्या खोएगा आदिवासी समाज?
यदि यह प्रक्रिया अनियंत्रित रही, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपने लोकदेवताओं, त्योहारों, नृत्यों, बोली-भाषाओं और जीवन पद्धति को न पहचान सकेंगी। वे न तो अपने पुरखों को याद रखेंगी, न अपने जंगलों की कथा जान पाएँगी। वे मानसिक रूप से ब्राह्मणवादी मशीनरी के भीतर एक ‘श्रमिक’ ‘मतदाता’ या ‘सांस्कृतिक गुलाम’ में परिवर्तित हो जाएँगे – जो अपनी असल आदिवासियत की पहचान खो चुका होगा।
यह लड़ाई केवल धार्मिक पहचान की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व और राजनीतिक भविष्य की है। अब समय है कि आदिवासी समाज अपने पारंपरिक ज्ञान, रीति-रिवाजों और देवताओं को दस्तावेज़ित करे।
अपनी भाषाओं और त्योहारों को विद्यालयों, समुदायों और मीडिया के ज़रिए पुनर्जीवित करे।
अपने नायकों – तिलका मांझी, बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हो, तांत्या भील, गुंडाधुर, रानी दुर्गावती इत्यादि को अपने आने वाली पीढ़ी तथा बच्चों के लिए नायक-नायिका बनाए। अपनी परंपरा, धरोहर एवं संस्कृति की सुरक्षा के लिए आदिवासी हर उस संस्था का प्रतिरोध करे जो उसकी पहचान को मिटाने की कोशिश कर रही है।
आदिवासी हिंदू नहीं हैं। वे भारत की आत्मा हैं – जड़ों से जुड़े, प्रकृति से जुड़े, संघर्ष से बने।
जो उनकी पहचान को मिटाना चाहता है, वह भारत की आत्मा को मिटा रहा है। वो भारत के मूल एवं प्राचीन पहचान हैं। उनकी संस्कृति सबसे प्राचीन, सभ्य तथा संमृद्धशाली संस्कृति है। तुच्छ राजनीतिक स्वार्थों के लिए आदिवासी संस्कृति की पहचान को विकृत एवं नष्ट करने वालों से सतर्क रहें। भारत के अंदर राजनीतिक संरक्षण में पैर पसार रहे ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक साम्राज्य से अपनी संस्कृति एवं आदिवासियत को बचाना वर्तमान समय में भारत के आदिवासियों की एक प्रमुख चुनौतियों में से है।
नोट- उपर्युक्त लेख में प्रस्तुत किए गये विचार लेखक राजेश सारथी (स्वत्रंत पत्रकार) के निजी विचार हैं। उनकी अनुमति से द राउज़र के मंच पर प्रकाशित किया गया है।
