स्वजनों को श्रद्धांजलि: उमढ़ते भावों का विरेचन

आप सभी को पहले ही बता दूँ कि जिस क्षण ये बातें लिखी जा रही हैं वह शोक से व्याकुल मेरे ग़मगीन भावों की सहजाभिव्यक्ति है। यहां किसी भी तरह के अन्य विचारों और चिंतन की अवधारणाओं को खोजना व्यर्थ है। यह मेरी अपनी टीस, स्व-पीड़ा एवं निजी अनुभूति हैं। यह मेरे अपने एकांत की भाव-वेदना है जो मुझे अंदर ही अंदर विकल और असहाय बना रही है। यह एक भावोद्रेक है जो लहरों की तरह उमड़ रही हैं जिसके आदि-मध्य-अंत का क्रम निर्धारित करना कठिन है। हुआ यूं कि आज(18.09.2025) दोपहर के करीब ढ़ाई बजे होंगे, मोबाइल फोन की घंटी बजती है। घर से चचेरे भाई का कॉल था। फोन उठाया तो उधर से आवाज़ आई की ‘‘भैय्या काका खतम होइ गएन’’। काका माने मेरे छोटे दादा श्री बिहारीलाल यादव, जिसे पापा-चाचा लोग घर में काका कहकर बुलाते थे। बाद की पीढ़ी में हम लोग भी उन्हें काका ही बुलाते रहे। ठीक इसी तरह काका अपने बड़े भाई यानी मेरे दादा(श्री श्यामलाल यादव) को भैय्या कहते थे तो परिवार में हम सभी लोग आज भी उन्हें भैय्या ही बुलाते हैं। मेरे दादा तीन भाई और एक बहन(बिटाई दीदी) थे, जिसमें मेरे दादा(श्यामलाल) सबसे बड़े उसके बाद क्रमशः हरीलाल यादव, बिहारीलाल यादव और बिटाई दीदी थी। मझले वाले दादा हरीलाल बहुत पहले ही घर छोड़कर कहीं चले गए थे, फिर वापस कभी नहीं लौटे। मेरे बचपन की स्मृतियों में उनका चेहरा मुझे याद नहीं है जबकि अपने परदादा स्वर्गीय श्री महादेव यादव की धूमिल स्मृति आज भी मेरे मस्तिष्क में संचित है। घर वाले बताते हैं कि मझले वाले दादा बहुत लंबे और हट्टे-कट्टे थे। एक बार घर में डाका पड़ा था तो वो अकेले ही डकैतों से भिड़ गए थे। चोर घर में घुस नहीं पाये थे। वो कहां गए आज तक नहीं मालूम। जब कुछ साल पहले मझली वाली दादी का निधन हुआ तो यह मान कर कि अब वो दुनिया में नहीं होंगे, उनका भी साथ में पिंडदान कर दिया गया।

खैर मैं तो काका की बात कह रहा था जिसका आज निधन हो गया। काका की उम्र 65 से 70 के बीच में रही होगी। लंबी कद-काठी और शालीन चेहरा। घर में वो इकलौते थे जो अपनी पीढ़ी में आईटीआई तक पढ़ाई किए थे। नौकरी लगी तो ज्वाइन ही नहीं करने गये क्योंकि तब नौकरी को तरजीह बहुत कम दी जाती थी और तनख्वाह बहुत कम मिलती थी। घर में खेती-बारी थी, खाने की कमी नहीं थी तो बाहर जाने की जरूरत नहीं महसूस हुई। बताते हैं कि घर में छोटे होने के कारण मेरी परदादी का मोह उनसे ज्यादा था, तो बाहर नहीं जाने दिया। यह भी कहा जाता है कि उसी समय उनकी नई-नई शादी हुयी थी तो बाहर न जाने की एक वज़ह वो भी थी।

बाँए स्मृतिशेष बिहारीलाल यादव और साथ में लाठी लिये उनके बड़े भाई श्यामलाल

बहरहाल जो भी हो आज जब कैंसर की वजह से उनके दुनिया से गुजरने की खबर मिली तो दिल्ली में बैठे-बैठे बार-बार मन भावुक हुआ जा रहा है। उनकी स्मृतियों का चित्र मानसपटल में उमड़-घुमड़ कर गायब हुआ जा रहा है। भावावेश में कुछ भी साफ-साफ नहीं सोंच पा रहा हूँ। घर वालों ने बताया कि आज ही अंतिम क्रिया(अंत्येष्टि) संपन्न हो जाएगी। पार्थिव शरीर को कल तक रोकना संभव नहीं है क्योंकि सभी नात-रिश्तेदार आ चुके है। मैं दिल्ली में हूँ और पिताजी हरियाणा में हैं। हमारे लिए कल सुबह से पहले किसी भी तरह घर पहँचना संभव नहीं है। पिता जी से बात हुई तो वो भी भावुक थे। बोले अंतिम बार उनका चेहरा देखना संभव नहीं है। हम लोग नहीं पहुँच पाएंगे। आज मेरी दादी(कल्लो देवी) का भी चेहरा याद आ रहा है। 30 दिसंबर 2021 को जब दादी को निधन हुआ था तो सुबह-सुबह फोन आया था कि ‘‘अम्मा नहीं रहीं’’ तो आनन-फानन में फ्लाइट बुक की और हवाईअड्डे पर पहुँचा तो बोर्डिंग में लेट हो जाने से फ्लाइट छूट गई। मन-ममोस के रहा गया था। आज वही दशा फिर हो रही है।

कमरे में बैठे बैठे सोच रहा हूँ तो दिल बोझिल हुआ जा रहा है। काका की कई बातें और स्मृतियाँ याद आ रही हैं। थोडी देर तक खुद को रोके रहा, फिर अचानक से आसुँओं ने जैसे इस भारी मन को दबाव से राहत देने का एक रास्ता खोज लिया हो। भावों का गुबार बह निकला मानो जैसे कोई बांध तोड़ कर पानी बह निकलता है। कुछ देर तक यह घटित होता रहा फिर हिचकते-सिसकते मन का दबाव थोड़ा कम हुआ। कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मन व्याकुल और बेचैन था। घर पर कॉल करके जायजा लिया फिर कमरे में घूमते-घूमते मन को सांत्वना देने लगा। उनके लिए कुछ न कर पाने की खीझ के कारण खुद को कोसने लगा। काका के स्वास्थ्य में लापरवाही और सही समय पर इलाज न हो पाने की कसक टीसने लगी। सोच-सोच कर मन झल्ला उठ रहा है। मन में एक बात उठती फिर दूसरी बात उसको काट देती। खुद के अंदर मानो एक चक्रवात चल रहा हो। खुद की बातों से दिल को सांत्वना देता फिर अगले क्षण उन बातों को खंडन करने लगता। जब अपने जनों का निधन होता है तो शायद सभी इस तरह की बेचैनियों से गुजरते होंगे। पता नहीं वो कैसे व्याकुल मन को शांत करते होंगे? हो सकता है कि जनम-मरण की इस प्राकृतिक व्यवस्था में सभी लोग अपने ढंग से इस परिस्थिति से निबाहने का उपाय कर लिये हो। शायद मृत्यु से निबाहने के लिए ही सारे परिचित, कुटंब और रिश्तेदार इकट्ठे होते हैं। सदियों की इस परंपरा में इकट्ठा होकर मृत्यु को स्वीकारने का यही उपाय विकसित हुआ हो। लेकिन मैं तो यहाँ अकेला हूँ।

जो भी हो किंतु आज अकेले बैठे-बैठे जब कुछ नहीं समझ में आ रहा था तो मन को शांत करने के लिए मैने यही उपाय चुना। आँसुओं के निकल जाने से दिल का बोझ थोड़ा हल्का सा हो गया था। किसी से बात करने का मन नहीं कर रहा था। छोटी बहन ने काका के कुछ फोटोग्राफ व्हट्सअप किये जिसे देखकर मन और भी व्यग्र हो गया। भावावेश में फोटो को व्हट्सअप स्टेटस पर लगा कर खबर की सूचना साझा किया तो ऐसा लगा कि मन में कुछ अटक गया है। लोगों के कमेंट देख कर मन बेचैन हुआ जा रहा था। सोचा कि स्टेटस डीलिट कर देता हूँ शायद मन शातं हो फिर अगले क्षण ये विचार भी खारिज हो गया। इस भावुक बेचैनी से निकलने के लिए लिखने का निश्चय किया। लैपटॉप खोला फिर काफी देर तक कुछ समझ ही नहीं आया कि क्या लिखूँ? कहाँ से शुरू करू ? किंतु लिखने में एक सुकून और भावों का डाइवर्जन दिखाई दिया। भावों पर बुद्धि का नियंत्रण धीरे-धीरे होने लगा। जो भाव अंतर्मन में संचरित हो रहे थे उनको शब्दों में बांधना कठिन लगा। बुद्धि ने निर्णायत्मक भूमिक अख्तियार कर लिया था। भावों को उसी भाषा में लिखना थोड़ा कठिन जान पड़ा क्योंकि लिखने पर शब्दों को सही-गलत की तराजू पर तौलने की प्रक्रिया से गुजरना है। भाव पर बुद्धि का सिकंजा बढ़ गया फिर भी भावोद्रक की गति इतनी है कि जो कुछ समझ में आ रहा है उसे लिख देना ही श्रेयस्कर प्रतीत हो रहा है।

जब मैं ये सब कुछ लिख रहा हूँ तो इसे अपने लिए लिख रहा हूँ। स्वशांति के लिए लिख रहा हूँ। काका के ग़म में लिख रहा हूँ। अपनी भावनाओं तथा एकांत से जूझने के लिए साहस जुटा रहा हूँ। परिवार से दूर काका की पुरानी स्मृतियों को महसूस करने के लिये लिख रहा रहा हूँ। यह मेरी निजी भावानुभूति है। इस भावप्रवणता से कोई अपने को जोड़ ले तो महज संयोग है। यहाँ सिर्फ मैं हूँ और मेरी भावनाएं हैं। काका के गुजरने का ग़म मानो मन को बीमार कर गया हो। दिल विषादग्रस्त हो गया है जिसे उपचार की जरूरत है। ये जो कुछ मैं लिख रहा हूँ वो एक उपचार ही है। खुद को भावनात्मक बवंडर से निकालने का एक प्रयत्न मात्र है। मुझे नहीं मालूम आप इस परिस्थिति से कैसे जूझते-निपटते? आप भी जरूर कुछ न कुछ करते, कोई उपाय खोजते, या फिर मन को कठोर कर लेते। मृत्यु को एक साधारण घटना मान कर विस्मृत कर देते। जैसे रोज किसी न किसी मृत्यु को हम उपेक्षित एवं विस्मृत करके अपनी जिदंगी को जिए जा रहे हैं। मृत्यु तो मृत्यु होती है चाहे वो अपने सगे-संबंधियों की हो या फिर पराए जन की। किंतु किसी को खो देने की टीस और व्याकुलता को झुठलाया तो नहीं जा सकता है। आज काका के गुजरने पर मैं व्यग्र एवं विह्वल हुआ बैठा हूँ वैसे कोई अन्य भी किसी अपने के खो देने की पीड़ा को दिल में महसूस कर रहा होगा। लेकिन फिर किसी पराए की पीड़ा भला हमारी पीड़ा कहां है? हम तो काका के जाने की पीड़ा को जानते हैं। शायद जिनकी पीड़ा हम नहीं जानते उनके लिए हमने सहानुभूति शब्द की खोज कर ली है। सहानुभूति किसी पराए के गुजर जाने की परिस्थिति से निजात पाने का एक उपाय है।

जो भी हो यहां अभी चिंतन का कोई काम नहीं है। भावों के गुच्छे हैं जिसे मैं बस शब्द दे रहा हूँ। आप होते तो कुछ और कर रहे होते लेकिन मेरे लिए यही उपाय है। काका तो अपने हैं, बचपन से अब तक उनके साथ स्मृतियों का एक जाल है। यहाँ विचारों का कोई स्थान नहीं है बल्कि काका के साथ जीया हुआ मेरा अपना जीवन है। उनके लिए तो श्रद्धांजलि भी नहीं लिख सकता हूँ क्योंकि श्रद्धांजलियाँ तो प्रायः पराए और सहानुभूतिपरक भावों की द्योतक हैं। वे अक्सर किसी की महानता एवं उनके योगदान को दुनिया में चिंन्हित कराने के लिए लिखी जाती हैं। लेकिन सवाल यहाँ किसी के गुजरने पर उस खालीपन या रिक्तता को महसूस करने का है, जैसे मेरी दादी के गुजरने की रिक्तता आज भी मेरे अंदर कायम है। आज भी लगता है कि वो घर में बैठी हैं। जब घर जाऊँगा तो पूछेगी कि मेरे लिए क्या लाए हो? ये खालीपन ही कचोट रहा है। क्योंकि अब जब घर जाऊँगा तो काका के बारे में पूछूँगां तो घर वाले अजीब निगाहों से देखेंगे। कुछ दिन में उस रिक्तता को सब स्वीकार कर लेंगे और भूल जाएंगे लेकिन मैं अपने बरामदे से सामने वाले घर के बरामदे में जब देखूँगा तो काका के बारे में पूछ बैठूँगा। जैसे दादी के गुजरने के बाद दिल्ली से घर जाने पर पूछ बैठता हूँ कि ‘‘अम्मा कहां है’’।  अचानक घर वालों के अजीब से चेहरे मुझे उनके न होने का अहसास करा देते हैं। कुछ यही होगा काका के बारे में पूछने पर। या पूंछने से पहले ही वो खालीपन बिजली की चमक की तरह सच्चाई को बयां कर देगा।

घर पर जितने भी रिस्तेदार जमा हुए थे वो अपने घरों को लौट गये हैं। काका के गुजरने का ग़म शायद बिटाई(दादा लोग बिट्टी भी बुलाते हैं) दीदी महसूस कर रहीं होंगी। वही रूकेगी और उस खालीपन को महसूस करेंगी। बाकी सब तो करीब-करीब चले गए हैं। तीन भाई और एक बहन में अब सिर्फ मेरे दादा और बिटाई दीदी ही बची हैं। तीनों दादियाँ पहले ही गुजर गई हैं। पहले मझली दादी फिर मेरी दादी और अंत में छोटी वाली दादी। आज छोटे दादा(काका) भी दुनिया से चल बसे। काश! जिस तरह दुनिया में जन्म लेने का क्रम है उसी तरह गुजरने का क्रम भी होता तो ये दुनिया कैसी होती? उम्र में मेरे दादा सबसे बड़े हैं किंतु उन्ही के सामने उनके दोनो छोटे भाइयों का इंतकाल हो गया। उनके दिल में क्या हलचल चल रही होगी? गांव-जवार के जमघट में ये बात किसी न किसी के मुंह से निकल ही जाती है। दादा क्या करेंगे? शायद सुनेंगे और दिल में अपनी आग को दफ़न कर लेंगे। कई ऐसी बाते हैं जो मन में कौंध रही हैं। मेरे लिए यह निर्धारण करना कठिन होता जा रहा है कि क्या-क्या लिखूँ? क्योंकि अब लग रहा है कि भावों का अतिरेक खत्म नहीं होने वाला है। क्या मैं अब मौन हो जाऊँ? मन को समझा लूँ कि यह एक प्राकृतिक घटना है जिस पर हमारा कोई कश-बस नहीं है। फिर सवाल कुलबुला जाता है कि जब तक व्यक्ति जिंदा रहता है तो ये सत्य हम क्यों भूले रहते हैं। अनुपस्थिति में ही किसी के जीवन की महत्ता क्यों महसूस हो पाती है। जिंदा रहते हम उनके प्रति अपनी वेदनाओं और भावनाओं को क्यों नहीं संप्रषित कर पाते? संबंधों का सूक्ष्म जाल तथा पारिवारिक-सामाजिक नीति-नियमों के बंधन अचानक दिंवगत होने के बाद क्यों ढीले और शिथिल पड़ जाते हैं। कौन सी मर्यादा एवं वर्जनाएं हमें सीमित करके रखती हैं। शायद अभी इसका कोई सार्थक जवाब खोजने की स्थिति में मैं नहीं हूँ। हमें अब शांत हो जाना चाहिए और मन एवं भावनाओं को उस खालीपन के स्वीकार करने के लिए अनुशासित कर लेना चाहिए। किंतु क्या ये सब इतना आसान है? यह शायद वैसा ही है जैसे मृत्यु को जानते हुए हम उससे अनभिज्ञ बने रहते हैं क्योंकि तब शायद मिथ्या शक्ति संबंधों के साथ जीना आसान हो जाता है। घर बात करते समय अक्सर काका की तबीयत पूछ लेता था लेकिन अब एक अवांछित सा झिझक अभी से समा गया है। यह झिझक उनके दुनिया में जिंदा होने के सबूत को नकार देगा। मन में उनकी एक झलक कौंध कर शांत हो जाएगी जैसे घनीभूत बादल के बीच कोई बिजली की कौंध उनके इस धरती से जुडे़ होने की अहसास करा जाएगी। मन में ये कौंध ही काका, दादी के होने का भान कराते रहेंगे। अलविदा काका।  

लेखकः – मुलायम सिंह (दादा के गम में पोते का स्मृतिलेख)

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