प्रेस का इतिहास भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जुड़ा हुआ है। भारत की आजादी को मुकम्मल करने में पत्र-पत्रिकाओं तथा अखबारों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। भारत में जो वर्ग आजादी के बाद सत्ता पर काबिज हुआ उसके हाथ में अखबार की ताकत तथा छापाखानों का मालिकाना हक भी था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अधिकतर शीर्ष नेताओं ने प्रेस की महत्ता को समझा और अपने स्तर पर किसी न किसी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राम मनोहर लोहिया तथा डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे नेताओं ने आज़ादी के आंदोलन के साथ-साथ पत्रकारिता को जन-जागृत करने, एकजुट करने, गुलामी, शोषण तथा हुकूमत के अत्याचार आदि के खिलाफ गोलबंद हो आवाज उठाने के लिए एक प्रभावशाली साधन के रूप में इस्तेमाल किया। डॉ. अंबेडकर जी का पूर्ण विश्वास था कि मीडिया देश के लाखों शोषित-वंचित समुदाय की जिंदगी में परिवर्तन ला सकता है। इसलिए उन्होंने मूकनायक, बहिष्कृत भारत तथा जनता जैसे पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। डॉ. अंबेडकर तत्कालीन भारतीय मीडिया के भेदभावपूर्ण रवैया तथा वर्गीय चरित्र के बारे में भी जानते थे। उन्हे अंदेशा था कि वहां सदियों से शोषित-वंचित, हाशिए के समाज के मुद्दों को जगह नहीं मिलेगी। दुर्भाग्य है कि आजादी के इतने सालों बाद भी भारतीय मीडिया का चरित्र एवं कार्यशैली कमोबेश यथावत है। मीडिया में प्रतिनिधित्व के सवाल पर जो आशंका डॉ.अंबेडकर ने जताई थी वह आज भी एक प्रमुख चुनौती के रूप में हमारे सामने खड़ी है।
वर्तमान दौर में अधिकतर मीडिया संस्थान तथा टीवी चैनल भारत के कॉर्पोरेट घरानों या पूंजीपतियों द्वारा पोषित या संचालित हो रहे हैं जिसमें पत्रकारिता के मूल्य तथा अवधारणाओं को दरकिनार करते हुए विज्ञापन, बाजारवाद, मुनाफे की लालसा में सत्ता के साथ गठजोड़ करके एक खास तरह की विचारधारा एवं विमर्श को परोसने का काम किया जा रहा है। भारतीय लोकतंत्र में जनता की आवाज़ कहा जाने वाला यह चौथा स्तंभ आज इतना जर्जर हो गया है कि भारतीय जनमानस का भरोसा इससे उठता जा रहा है। आज संविधान में वर्णित लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ-साथ पत्रकारिता के मूल्य भी खतरे में हैं। भारतीय मीडिया उद्योग में अक्सर गैरजिम्मेदाराना तरीके से खबरों को संपादित करना, टीआरपी के लिए सनसनीखेज व मशालेदार खबरों को परोसना तथा फेक न्यूज़ चलाना, निजी संबंधों के लाभ के लिए पेड न्यूज चलाना, जनसरोकार से जुड़ी खबरों को दबाने या उससे ध्यान भटकाने जैसी घटनाएं वर्तमान मीडिया की परिपाटी बन गई हैं। खबरों की आड़ में मीडिया घराने सत्ता के साथ व्यापारिक समझौते कर रहे हैं। सत्ता के सुर में सुर मिलाकर प्रशस्तिगान करने वाले चैनलों का एक गिरोह बन चुका है। आज के दौर के पत्रकार दो हजार के नोट में चिप लगी होने की खबरों के साथ जनता की चेतना को विकृत करने वाली पत्रकारिता कर रहे हैं। उनके टीवी प्रसारणों के विभाजनकारी एजेंडे एवं विमर्शो को देखकर भारतीय पत्रकारिता के चरित्र एवं नैतिक पतन का अंदेशा लगाया जा सकता है। जो भी हो लेकिन आज अधिकतर चैनलों के गुप्त ए़जेंडे तथा नीयत का पर्दाफ़ाश हो चुका है। सत्ता के साथ गलबहियाँ मिलाने के बाद टीवी चैनलों पर तटस्थ एवं पारदर्शी पत्रकारिता का स्वांग भरने वालों के असली चेहरों को देश की जनता, खासकर शिक्षित व उपेक्षित वर्ग के लोग समझ रहे हैं।
द राउजर डिजीटल ऑनलाइन मीडिया की शुरूआत करने की मुख्य वज़हें वही हैं जिसके बारे में डॉ. अंबेडकर ने अपने समय की मीडिया के चरित्र के बारे में चिंताएँ जाहिर की थी। मीडिया तथा अन्य संस्थानों में प्रतिनिधित्व का सवाल, हाशिए की जनता के मुद्दे, मुल्क में शोषित-वंचित जनता को जागरूक करना, न्याय प्राप्ति के लिए उन्हे प्रेरित एवं प्रोत्साहित करना तथा सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मुद्दों पर वैकल्पिक विमर्शों को जगह देना हमारी प्राथमिकता होगी। लोकतांत्रिक, समतामूलक विचारधारा एवं संवैधानिक मूल्यों को प्रचारित-प्रसारित करना द राउजर की प्रतिबद्धताओं में शामिल होगा। हमारा उद्देश्य स्पष्ट है। यदि आप अपने विचारों को निडरतापूर्वक अभिव्यक्त करना या किसी सम-सामयिक मुद्दों पर अपने विचार या टिप्पणी जाहिर कर चाहते हैं तो द राउजर के इस मुहिम का भागीदार बनिये। कॉर्पोरेट पोषित वर्चस्वशाली मीडिया उद्योग के अभिजात्य गिरोह द्वारा किये जा रहे मानसिक एवं वैचारिक अपहरण वाले प्रोपेगैण्डा उत्पादों से आम जनमानस को बचाने एवं जागरूक करने में द राउजर को सहयोग करिए। सीमित संसाधन,अदम्य साहस तथा समर्पित उदेश्य के साथ शुरू किया गया यह हमारा छोटा किंतु महत्वपूर्ण कदम है। आप हमारी पत्रकारिता से जुड़े, वेबसाइट पर कथ्य एवं खबरों को पढ़े, अपने विचारों को लिखें और शेयर करें तथा अपना सुझाव एवं सहयोग प्रदान करें।
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